कुमाऊॅं के लोकगीतों का सांस्कृतिक एवं सम्वेदनात्मक पक्ष


कुमाऊॅं व गढ़वाल क्षेत्र में कुछ गीतों को ईश्वर के आह्वान् हेतु गाया जाता है जिन मे पूजा,विनय,आराधना स्तुति की भावना विद्यमान रहती है। मुख्य रूप से ये झोड़े के स्वरूप में प्रस्तुत किये जाते हैं जिन मे सामूहिक नृत्य किया जाता है। इनगीतोंमें पद संचालन लय ,गति, सहयोग, का संगम देखने को मिलता है जिससे इनके बीच अनुशासन की भावना दृष्टिगोचर होती है। स्थानीय त्योहारों में और किसी भी कार्य को करने से पूर्व सर्वप्रथम ईश्वर से आशीर्वचन लिए जाते हैं जिनमें मुख्यतः गणेश, विष्णु, शिव के विभिन्नस्वरूप, प्रति, सूर्य,भूमि देवता,ग्रामदेवता,माता पार्वती के स्वरूप भवानी, गौरी, दुर्गा आदि की स्तुति की जाती है। इनके पीछे यह भावना विद्यमान रहती है कि हम जो भी कार्य करें उसमें आप अपनी कृपाष्टि हमारे अनुकूल बनाए रखें। वस्तुतः प्रत्येक गीत में स्थानीय सामाजिक,सांस्कृतिक व शैक्षिक पहलू प्रतिबिम्बित होता है। ये गीत प्राकृतिक भौगोलिक सामाजिक आदि परिस्थितियो से सम्बन्धित हैं इसीलिये इनमें जीवन संघर्ष, हर्ष-उल्लास, वातावरण की सभी भावनाओं का समावेश है। इन गीतों की विशिष्टता, प्राचीनता के साथ नवीनता, इनकी जीवन शक्ति है और ये गीतपुरूष व नारी दोनो के द्वारा रचित होतें हैं।ये गीत अवसर विशेष से भी संबंधित होते है और इनका सम्बन्ध जनमानस कें हृदय से भी है परन्तु इनका मुख्य उद्देश्य जनमानस को जागृत करना और अपनी संस्कृति व परम्परा से परिचित करवाना भी

है।प्रस्तुत गीत कुमाऊॅं व गढ़वाल दोनों से ही संबंधित है जिसमें इन दोनों क्षेत्रों के देवी देवता, धार्मिकस्थल, स्थानीय देवी-देवताओं को सम्मिलित किया गया है। इन गीतों में यह बताया गया है कि प्रत्येक वस्तु में ईश्वर की कृपा विद्यमान हैं और इन्ही की छत्र छाया से मानव जीवन सुखी व समृद्ध रहेगा। शिक्षा की दृष्टि से देखा जाय तो इन लोकगीतों में मूल्य शिक्षा दिखाई देती है जो मानव जीवन के लिये एक आवश्यक शर्त है। मूल्यो के संचरण के द्वारा ही व्यक्ति आदर, सम्मान, ईमानदारी, सत्यता सहयोग की भावना से परिपूर्ण होता है।लोक गीत इन मूल्यों का संचरण करने में सक्षम होते हैं क्योकि ये लोक प्रवाह में निरंतर जीवित हो कर विद्यमान रहता है।इन गीतो का शैक्षिक महत्व तब और भी अधिक बढ़ जाता है जब ये सामान्य जनो के उद्गार स्वरूप निकलते हैं और सभी लोगों के अंतर्मन में रच बस जाते है। गीत भावना प्रधान, व मन से सीधी निकलने वाली अभिव्यक्तियां हैं इसलिये ये जनमानस को आसानी से प्रभावित कर लेते हैं। आह्वान गीत

दैणा होया खोली का गणेशा, दैणा होया मोरी का नरैणा................. दैणा होया पंचनामा देवा रे, दैणा होया भूमि का भूम्याला..रे....... दैणा होया बद्रीकेदारा रे, दैणा होया ऊॅंचो कैलाशा..रे.............. दैणा होया गंगोत्री यमुनोत्री, दैणा होया हरि का हरिद्वारा रे.......... दैणा होया सिमनाथ राजा, दैणा होया नौपटिनरसिंगा रे......... दैणा होया आदि भवानी रे, दैणा होया पितरदेवा रे .......... एक अन्य गीत में भगवती माता से धर्म द्वार खोलने की विनय की गई है जिस में देवी के प्रश्न करने पर कि मेरे लिये क्या क्या भेट लाये हो पर उत्तर दिया गया कि दो जोड़े बकरे,दो जोड़े निशाण या धर्म घ्वजा, सोने का छत्र, आदि लाये है। वस्तुओं की संख्या घटाते व बढ़ाते हुये गीत को समयानुसार निश्चित कर लिया जाता है। इस प्रकार प्रश्न-उत्तर शैली में गीत को सम्पूर्ण किया जाता ओहो ए गो री गंगा भागीरथी क के भलरेवाड़ा ओहो खोलि दे माता खोलिभवानी धरम केवाड़ा ओहो के ल्येरे छै भेटिपेंढ़ा के खोलूॅं केवाड़ा ओहो ,द्वी जौंयांका लाखा ल्ये रयूॅं , खौलि दे केवाड़ा ओहो गोरी गंगा भागीरथी क केभल रेवाड़ा ओहो के ल्येरे छै भेटि पेंढ़ा के खोलूॅं केवाड़ा ओहो खोलि दे माता खोलि भवानी धरम के वाड़ा द्वी जोंया निशाण ल्येयूँ तेरा दरवारा ओ हो एगौरी गंगा भागीरथी क के भल रेवाड़ा ओ हो खोलि दे माता खोलि भवानी धरम केवाड़ा ओ हो के ल्येरे छै भेटि पेंढ़ा के खोलूॅं केवाड़ा द्वी जोंया नाङारा ल्ये रयूं, खोलि दे केवाड़ा ओ हो गौरी गंगाभागीरथी क के भलरेवाड़ा ओ हो खोलि दे माता खोलि भवानी धरम केवाड़ा ओहो के ल्येरे छै भेटि पेंढ़ा के खोलूॅं केवाड़ा ओ हो एगौरी गंगा भागीरथी क के भलरेवाड़ा ओ हो खोलि दे माता खोलि भवानी धरम केवाड़ा ओ हो के ल्येरे छै भेटिपेंढ़ा के खोलूॅं केवाड़ा ओहो सुनूं क छत्र ल्ये रयूं, माता त्यारा दरबारा ओहो एगौरी गंगा भागीरथी क के भल रेवाड़ा ओहो खोलि दे माता खोलि भवानी धरम केवाड़ा ओहो के ल्येरे छै भेटि पेंढ़ा, के खोलूॅं केवाड़ा ओहो मींहणिं सुफल ह्ये,तु छै मेरि माता। ओहोभरपुर भनार करिये,तब छै तेरि बाता। ओहो एगौरी गंगा भागीरथी क, के भल रेवाड़ा ओहो खोलि दे माता खोलि भवानी, धरमकेवाड़ा ओहो के ल्येरे छै भेटिपेंढ़ा, के खोलूॅंकेवाड़ा ओ हो तू देवी सुफल ह्ये,म्यर धरिये ख्याला ओहो तूहुणीं दणडांग करूॅ मिंरातिया बियाला। ओहो एगौरी गंगाभागीरथी क के भल रेवाड़ा ओहो खोलि दे माता खोलि भवानी धरमकेवाड़ा

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